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mahabharat 7.45.17-18: विद्या और बल से संपन्न, तरुण अवस्था वाले, अत्यन्त संयमी तथा किसी भी वीर राजकुमार द्वारा पराजित न किये जा सकने वाले सुभद्रा के वीर पुत्र को युद्धस्थल में बाणों की वर्षा से आच्छादित होते हुए देखकर राजा दुर्योधन बहुत प्रसन्न हुआ और उसने मान लिया कि अब अभिमन्यु यमराज के लोक में पहुँच गया है॥ 17-18॥   |   mahabharat अध्याय 7.45: अभिमन्युके द्वारा सत्यश्रवा, क्षत्रियसमूह, रुक्मरथ तथा उसके मित्रगणों और सैकड़ों राजकुमारोंका वध और दुर्योधनकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 45: अभिमन्युके द्वारा सत्यश्रवा, क्षत्रियसमूह, रुक्मरथ तथा उसके मित्रगणों और सैकड़ों राजकुमारोंका वध और दुर्योधनकी पराजय  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  7.45.17-18 
शूरै: शिक्षाबलोपेतैस्तरुणैरत्यमर्षणै:।
दृष्ट्वैकं समरे शूरं सौभद्रमपराजितम्॥ १७॥
छाद्यमानं शरव्रातैर्हृष्टो दुर्योधनोऽभवत्।
वैवस्वतस्य भवनं गतं ह्येनममन्यत॥ १८॥
 
 
अनुवाद
विद्या और बल से संपन्न, तरुण अवस्था वाले, अत्यन्त संयमी तथा किसी भी वीर राजकुमार द्वारा पराजित न किये जा सकने वाले सुभद्रा के वीर पुत्र को युद्धस्थल में बाणों की वर्षा से आच्छादित होते हुए देखकर राजा दुर्योधन बहुत प्रसन्न हुआ और उसने मान लिया कि अब अभिमन्यु यमराज के लोक में पहुँच गया है॥ 17-18॥
 
King Duryodhan was very pleased to see the valiant son of Subhadra, who was blessed with education and strength, was of youthful age, was extremely intemperate and could not be defeated by any valiant prince, being alone covered with a hail of arrows in the battlefield. He assumed that now Abhimanyu had reached the world of Yamraj.॥ 17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)