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श्लोक 7.43.19  |
यो यो हि यतते भेत्तुं द्रोणानीकं तवाहित:।
तं तमेव वरं प्राप्य सैन्धव: प्रत्यवारयत्॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| तुम्हारा जो भी शत्रु द्रोणाचार्य की व्यूहरचना को तोड़ने का प्रयत्न करेगा, जयद्रथ उस महारथी के पास पहुँचकर उसे रोक देगा ॥19॥ |
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| Whichever enemy of yours would try to break the formation of Dronacharya, Jayadratha would reach that great warrior and stop him. ॥ 19॥ |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि जयद्रथयुद्धे त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें जयद्रथका युद्धविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४३॥
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