श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 42: अभिमन्युके पीछे जानेवाले पाण्डवोंको जयद्रथका वरके प्रभावसे रोक देना  »  श्लोक 17-19
 
 
श्लोक  7.42.17-19 
पाण्डवेयानहं संख्ये भीमवीर्यपराक्रमान्।
वारयेयं रथेनैक: समस्तानिति भारत॥ १७॥
एवमुक्तस्तु देवेशो जयद्रथमथाब्रवीत्।
ददामि ते वरं सौम्य विना पार्थं धनंजयम्॥ १८॥
वारयिष्यसि संग्रामे चतुर: पाण्डुनन्दनान्।
एवमस्त्विति देवेशमुक्त्वाबुद्धॺत पार्थिव:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! मैं रथ द्वारा अकेले ही समस्त पाण्डवों को परास्त कर दूँ और उन्हें युद्ध में आगे बढ़ने से रोक दूँ। भारत। उसके ऐसा कहने पर देवेश्वर भगवान शिव ने जयद्रथ से कहा - 'सौम्य! मैं तुम्हें वरदान देता हूँ। तुम कुन्तीपुत्र अर्जुन को छोड़कर शेष चारों पाण्डवों को युद्ध में (एक दिन के लिए) आगे बढ़ने से रोकोगे।' तब राजा जयद्रथ देवेश्वर महादेव से 'एवमस्तु' कहकर उठे। 17-19॥
 
Lord! May I single-handedly defeat all the Pandavas with a chariot and stop them from moving forward in the war. India On his saying this, Deveshwar Lord Shiva said to Jayadratha – 'Soumya! I give you a boon. You will stop the remaining four Pandavas, except Kunti's son Arjun, from moving forward in the war (for one day).' Then King Jayadratha woke up saying 'Evamastu' to Deveshwar Mahadev. 17-19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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