श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 42: अभिमन्युके पीछे जानेवाले पाण्डवोंको जयद्रथका वरके प्रभावसे रोक देना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  7.42.16 
एवमुक्तस्तु शर्वेण सिन्धुराजो जयद्रथ:।
उवाच प्रणतो रुद्रं प्राञ्जलिर्नियतात्मवान्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
भगवान शंकर की यह बात सुनकर सिन्धुराज जयद्रथ ने अपने मन और इन्द्रियों को वश में करके भगवान रुद्र को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा-॥16॥
 
On hearing Lord Shankar say this, King of Sindhus, Jayadratha, controlling his mind and senses, bowed down to Lord Rudra and with folded hands said -॥ 16॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd