श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 42: अभिमन्युके पीछे जानेवाले पाण्डवोंको जयद्रथका वरके प्रभावसे रोक देना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  7.42.13 
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्य: प्रियेभ्य: संनिवर्त्य स:।
क्षुत्पिपासातपसह: कृशो धमनिसंतत:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
अपनी रुचि के विषयों से अपनी समस्त इन्द्रियों को हटाकर, भूख, प्यास और गर्मी की पीड़ा सहते हुए जयद्रथ अत्यन्त दुर्बल हो गया। उसके शरीर की नसें और धमनियाँ दिखाई देने लगीं॥13॥
 
Having withdrawn all his senses from the objects of his liking and enduring the pain of hunger, thirst and heat, Jayadratha became very weak. The veins and arteries of his body became visible.॥ 13॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd