श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 38: अभिमन्युके द्वारा शल्यके भाईका वध तथा द्रोणाचार्यकी रथसेनाका पलायन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  7.38.22 
शरान् विचित्रान् सुबहून् रुक्मपुङ्खाञ्छिलाशितान्।
मुमोच शतश: क्रुद्धो गभस्तीनिव भास्कर:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जैसे सूर्य अपनी सहस्त्रों किरणों को सब ओर फैला देता है, उसी प्रकार क्रोध में भरे हुए अभिमन्यु ने सान पर तीखे तथा सुवर्णमय पंखों से सुसज्जित सैकड़ों विचित्र एवं असंख्य बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी।
 
Just as the Sun spreads its thousands of rays in all directions, similarly Abhimanyu, filled with anger, began to shower hundreds of strange and numerous arrows, sharpened on the whetstone and equipped with golden feathers.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)