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श्लोक  7.38.17 
दूरमस्य गुरुं भारं साध्वसं च पुन: पुन:।
संदधद् विसृजंश्चेषून् निर्विशेषमदृश्यत॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उसका भारी बोझ और डर दूर हो गया था। वह बार-बार निशाना साधते और तीर छोड़ते हुए भी वैसा ही लग रहा था। 17.
 
The heavy burden and fear had gone away from him. He looked the same even as he repeatedly aimed and released arrows. 17.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)