श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 36: अभिमन्युका उत्साह तथा उसके द्वारा कौरवोंकी चतुरंगिणी सेनाका संहार  »  श्लोक 42-44
 
 
श्लोक  7.36.42-44 
एवमेकेन तां सेनां सौभद्रेण शितै: शरै:॥ ४२॥
भृशं विप्रहतां दृष्ट्वा स्कन्देनेवासुरीं चमूम्।
त्वदीयास्तव पुत्राश्च वीक्षमाणा दिशो दश॥ ४३॥
संशुष्कास्याश्चलन्नेत्रा: प्रस्विन्ना रोमहर्षिण:।
पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
जैसे कार्तिकेय ने राक्षसों की सेना का नाश कर दिया था, उसी प्रकार सुभद्रापुत्र अभिमन्यु ने अपने तीखे बाणों से समस्त कौरव सेना का संहार कर दिया है। यह देखकर आपके पुत्र और सैनिक भयभीत होकर सब ओर देखने लगे। उनके मुख सूख गए थे, नेत्र चंचल हो गए थे, सबके शरीर पर पसीना आ गया था और रोंगटे खड़े हो गए थे। अब वे भागने में उत्साह दिखाने लगे। शत्रुओं को परास्त करने के लिए उनके मन में कोई उत्साह नहीं रह गया था॥42-44॥
 
Just as Kartikeya had destroyed the army of demons, similarly Abhimanyu, the son of Subhadra, has completely destroyed the entire Kaurava army with his sharp arrows. Seeing this, your sons and soldiers were frightened and started looking in all directions. Their faces had dried up, eyes had become restless, sweat had come out on all their bodies and their hair had stood up. Now they started showing enthusiasm in running away. There was no enthusiasm left in their minds to defeat the enemies. ॥ 42-44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)