|
| |
| |
श्लोक 7.34.24-25  |
तत: प्रववृते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम्॥ २४॥
तावकानां परेषां च मृत्युं कृत्वा निवर्तनम्॥ २५॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| तत्पश्चात् ‘मैं मरकर ही युद्ध से निवृत्त होऊँगा’ ऐसा निश्चय करके आपके और शत्रु योद्धाओं के बीच बड़ा भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ, जो रोंगटे खड़े कर देने वाला था ॥ 24-25॥ |
| |
| Thereafter having resolved that 'I will retire from the war only after death', a very fierce battle began between you and the enemy's warriors, which was spine-chilling. ॥ 24-25॥ |
| |
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि चक्रव्यूहनिर्माणे चतुस्त्रिंशोऽध्याय:॥ ३४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें चक्रव्यूहका निर्माणविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|