श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 34: संजयके द्वारा अभिमन्युकी प्रशंसा, द्रोणाचार्यद्वारा चक्रव्यूहका निर्माण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.34.2 
सत्त्वकर्मान्वयैर्बुद्धॺा कीर्त्या च यशसा श्रिया।
नैव भूतो न भविता नैव तुल्यगुण: पुमान्॥ २॥
 
 
अनुवाद
सत्त्वगुण, कर्म, कुल, बुद्धि, यश, कीर्ति और ऐश्वर्य की दृष्टि से युधिष्ठिर के समान न तो कोई पुरुष हुआ है और न कभी होगा ॥2॥
 
There has never been and never will be any man like Yudhishthir in terms of Sattva Guna, deeds, family, wisdom, fame, glory and prosperity. ॥2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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