श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 34: संजयके द्वारा अभिमन्युकी प्रशंसा, द्रोणाचार्यद्वारा चक्रव्यूहका निर्माण  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  7.34.18 
पौत्रं तव पुरस्कृत्य लक्ष्मणं प्रियदर्शनम्।
अन्योन्यसमदु:खास्ते अन्योन्यसमसाहसा:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
आपके प्रिय पौत्र लक्ष्मण को आगे करके उन्होंने आक्रमण किया। वे सब एक-दूसरे की पीड़ा को समान रूप से समझते थे और समान रूप से साहसी थे॥18॥
 
They attacked with your beloved grandson Lakshman in the lead. They all understood each other's pain equally and were equally courageous.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)