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mahabharat 7.33.18: हे राजन! उस समय द्रोणाचार्य ने जो व्यूह रचना की थी, वह शत्रुओं को संताप देते हुए मध्याह्न के समय गतिमान सूर्य के समान शोभायमान हो रही थी। उसे परास्त करना तो दूर, उसकी ओर देखना भी कठिन था।   |   mahabharat अध्याय 7.33: दुर्योधनका उपालम्भ, द्रोणाचार्यकी प्रतिज्ञा और अभिमन्युवधके वृत्तान्तका संक्षेपसे वर्णन   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  7.33.18 
तत्र द्रोणेन विहितो व्यूहो राजन् व्यरोचत।
चरन् मध्यंदिने सूर्य: प्रतपन्निव दुर्दृश:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! उस समय द्रोणाचार्य ने जो व्यूह रचना की थी, वह शत्रुओं को संताप देते हुए मध्याह्न के समय गतिमान सूर्य के समान शोभायमान हो रही थी। उसे परास्त करना तो दूर, उसकी ओर देखना भी कठिन था।
 
O King! At that time, the formation that Dronacharya had created there was looking beautiful like the Sun moving at noon, tormenting the enemies. Forget about defeating it, it was very difficult to even look at it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)