श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 30: अर्जुनके द्वारा वृषक और अचलका वध, शकुनिकी माया और उसकी पराजय तथा कौरव-सेनाका पलायन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  7.30.14 
दृष्ट्वा विनिहतौ संख्ये मातुलावपलायिनौ।
भृशं मुमुचुरश्रूणि पुत्रास्तव विशाम्पते॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे प्रजानाथ! युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले अपने दोनों मामाओं को युद्ध में मारा गया देखकर आपके सभी पुत्र अपनी आँखों से आँसू बहाने लगे॥14॥
 
O Prajanath! On seeing their two maternal uncles, who never turned their backs in the war, killed in the war, all your sons began shedding tears from their eyes. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)