को ह्यर्जुनं योधयितुं त्वदन्य: पार्थिवोऽर्हति॥ २१॥
यस्य दिव्यानि कर्माणि प्रवदन्ति मनीषिण:।
अमानुषैश्च संग्रामस्त्र्यम्बकेण महात्मना॥ २२॥
तस्माच्चैव वरं प्राप्तो दुष्प्रापमकृतात्मभि:।
कोऽन्य: शक्तो रणे जेतुं पूर्वं यो न जितस्त्वया॥ २३॥
अनुवाद
‘आपके सिवा राजा अर्जुन के साथ और कौन युद्ध कर सकता है? जिनके दिव्य कर्मों का वर्णन बुद्धिमान पुरुष करते हैं, जिन्होंने दैत्यों और दानवों आदि मनुष्येतर प्राणियों के साथ युद्ध किया है, जिन्होंने त्रिनेत्रधारी महात्मा भगवान शंकर के साथ युद्ध करके उनसे वह महान वर प्राप्त किया है जो इन्द्रियों पर विजय न पा सकने वाले पुरुषों के लिए अत्यंत दुर्लभ है, जिन्हें आप भी पहले नहीं हरा सके थे, उन्हें आज युद्ध में और कौन हरा सकता है?॥ 21-23॥
‘Who else can fight with King Arjuna except you? Whose divine deeds are described by wise men, who has fought with non-human beings like demons and devils, who has fought with the three-eyed Mahatma Bhagwan Shankar and received from him that great boon which is very rare for men who have not been able to conquer the senses, whom even you have not been able to defeat earlier, who else can defeat him in battle today?॥ 21-23॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)