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mahabharat 7.29.35: तब मनस्विनी पृथ्वीदेवी 'जो आज्ञा' कहकर कृतज्ञ भाव से चली गईं। वह नरकासुर भी (उस अस्त्र को पाकर) शत्रुओं को पीड़ा देने वाला और अत्यंत अजेय हो गया॥35॥   |   mahabharat अध्याय 7.29: अर्जुन और भगदत्तका युद्ध, श्रीकृष्णद्वारा भगदत्तके वैष्णवास्त्रसे अर्जुनकी रक्षा तथा अर्जुनद्वारा हाथीसहित भगदत्तका वध   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 29: अर्जुन और भगदत्तका युद्ध, श्रीकृष्णद्वारा भगदत्तके वैष्णवास्त्रसे अर्जुनकी रक्षा तथा अर्जुनद्वारा हाथीसहित भगदत्तका वध  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  7.29.35 
तथेत्युक्त्वा गता देवी कृतकामा मनस्विनी।
स चाप्यासीद् दुराधर्षो नरक: शत्रुतापन:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
तब मनस्विनी पृथ्वीदेवी 'जो आज्ञा' कहकर कृतज्ञ भाव से चली गईं। वह नरकासुर भी (उस अस्त्र को पाकर) शत्रुओं को पीड़ा देने वाला और अत्यंत अजेय हो गया॥35॥
 
Then saying 'Jo agya', Manaswini Prithvidevi went away gratefully. That Narakasura also (after getting that weapon) became a tormentor of enemies and extremely invincible. 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)