श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 29: अर्जुन और भगदत्तका युद्ध, श्रीकृष्णद्वारा भगदत्तके वैष्णवास्त्रसे अर्जुनकी रक्षा तथा अर्जुनद्वारा हाथीसहित भगदत्तका वध  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  7.29.28 
अपरा कुरुते कर्म मानुषं लोकमाश्रिता।
शेते चतुर्थी त्वपरा निद्रां वर्षसहस्रिकम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
तीसरा रूप (मैं स्वयं) मनुष्य लोक में आश्रय लेकर नाना प्रकार के कर्म करता हूँ और चौथा रूप वह है जो समुद्र के जल में एक हजार युगों तक विश्राम करता है॥ 28॥
 
The third form (I myself) takes shelter in the human world and performs various kinds of deeds and the fourth form is the one which rests in the waters of the ocean for a thousand yugas.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)