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mahabharat 7.27.14: हे कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार मन से विचार करके अर्जुन की यह भावना बहुत प्रबल हो गई कि मुझे संशप्तकों को मारने का ही प्रयत्न करना चाहिए ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 7.27: अर्जुनका संशप्तक-सेनाके साथ भयंकर युद्ध और उसके अधिकांश भागका वध   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 27: अर्जुनका संशप्तक-सेनाके साथ भयंकर युद्ध और उसके अधिकांश भागका वध  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  7.27.14 
तस्य बुद्धॺा विचार्यैवमर्जुनस्य कुरूद्वह।
अभवद् भूयसी बुद्धि: संशप्तकवधे स्थिरा॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार मन से विचार करके अर्जुन की यह भावना बहुत प्रबल हो गई कि मुझे संशप्तकों को मारने का ही प्रयत्न करना चाहिए ॥14॥
 
Kurushrestha! After thinking like this with his mind, Arjun's feeling became very strong that he should only try to kill the Samsaptaks. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)