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श्लोक 7.23.98  |
शुश्रुवुर्नामगोत्राणि वीराणां संयुगे तदा।
द्रोणमाद्रवतां राजन् स्वयंवर इवाहवे॥ ९८॥ |
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| अनुवाद |
| महाराज! उस समय द्रोणाचार्य पर आक्रमण करने वाले योद्धाओं के नाम और गोत्र युद्धस्थल में उसी प्रकार सुनाई दे रहे थे, जैसे स्वयंवर में सुनाई देते हैं। |
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| King! At that time, the names and clans of the warriors attacking Dronacharya were heard on the battlefield in the same manner as they are heard in a swayamvara. |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि हयध्वजादिकथने त्रयोविंशोऽध्याय:॥ २३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें अश्व और ध्वज आदिका वर्णनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३॥
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