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श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 22: द्रोणके युद्धके विषयमें दुर्योधन और कर्णका संवाद  »  श्लोक 4-6
 
 
श्लोक  7.22.4-6 
जृम्भमाणमिव व्याघ्रं प्रभिन्नमिव कुञ्जरम्।
त्यजन्तमाहवे प्राणान् संनद्धं चित्रयोधिनम्॥ ४॥
महेष्वासं नरव्याघ्रं द्विषतां भयवर्धनम्।
कृतज्ञं सत्यनिरतं दुर्योधनहितैषिणम्॥ ५॥
भारद्वाजं तथानीके दृष्ट्वा शूरमवस्थितम्।
के शूरा: संन्यवर्तन्त तन्ममाचक्ष्व संजय॥ ६॥
 
 
अनुवाद
भरद्वाजनंदन महाधनुर्धर पुरुषसिंह द्रोणाचार्य को युद्ध में डटे हुए, जम्भाई लेते हुए व्याघ्र और मदिरा की धारा बहाने वाले गजराज के समान, युद्ध में प्राणों की आहुति देने को उद्यत, कवच से सुसज्जित, विचित्र प्रकार से युद्ध करने वाले, शत्रुओं को भय देने वाले, कृतज्ञ, सत्यवादी, दुर्योधन के हितैषी और पराक्रमी देखकर कौन-से योद्धा पीछे नहीं हटे? संजय! यह कथा मुझसे कहो। 4-6॥
 
Which warriors, seeing Bhardwajnandan great archer Purushasingh Dronacharya standing firm in the battle, like a yawning tiger and a Gajraj who exudes a stream of liquor, ready to sacrifice their lives in battle, equipped with armour, who fights in strange ways, who instills fear in the enemies, grateful, truthful, well-wisher of Duryodhana and valiant, did not return? faced? Sanjay! Tell me this story. 4-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)