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mahabharat 7.21.30: जैसे प्रज्वलित अग्नि सम्पूर्ण वन को जला डालती है, उसी प्रकार संजयवंश के क्षत्रियगण क्रोध में भरे हुए वीर द्रोणाचार्य को देखकर काँपने लगे, जो अपने स्वर्णमय रथ से शत्रु सेना को जला रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 7.21: द्रोणाचार्यके द्वारा सत्यजित् , शतानीक,दृढसेन,क्षेम, वसुदान तथा पांचालराजकुमार आदिका वध और पाण्डव-सेनाकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 21: द्रोणाचार्यके द्वारा सत्यजित् , शतानीक,दृढसेन,क्षेम, वसुदान तथा पांचालराजकुमार आदिका वध और पाण्डव-सेनाकी पराजय  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  7.21.30 
तं दहन्तमनीकानि क्रुद्धमग्निं यथा वनम्।
दृष्ट्वा रुक्मरथं वीरं समकम्पन्त सृंजया:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जैसे प्रज्वलित अग्नि सम्पूर्ण वन को जला डालती है, उसी प्रकार संजयवंश के क्षत्रियगण क्रोध में भरे हुए वीर द्रोणाचार्य को देखकर काँपने लगे, जो अपने स्वर्णमय रथ से शत्रु सेना को जला रहे थे।
 
Just as a blazing fire burns down an entire forest, similarly the Kshatriyas of the Sanjaya dynasty began to tremble on seeing the valiant Dronacharya, who, filled with anger, was burning down the enemy forces with his golden chariot.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)