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mahabharat 7.202.32: जिनके अनेक रूप हैं, जो सब रूपों वाले हैं और जो सबको प्रिय हैं, जो छाल के वस्त्रों से प्रेम करते हैं, जो सिर पर पगड़ी धारण करते हैं, जिनका मुख सुन्दर है, जिनके हजार नेत्र हैं और जो वर्षा करते हैं, उन भगवान शंकर को नमस्कार है॥32॥   |   mahabharat अध्याय 7.202: व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 202: व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  7.202.32 
बहुरूपाय सर्वाय प्रियाय प्रियवाससे।
उष्णीषिणे सुवक्त्राय सहस्राक्षाय मीढुषे॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
जिनके अनेक रूप हैं, जो सब रूपों वाले हैं और जो सबको प्रिय हैं, जो छाल के वस्त्रों से प्रेम करते हैं, जो सिर पर पगड़ी धारण करते हैं, जिनका मुख सुन्दर है, जिनके हजार नेत्र हैं और जो वर्षा करते हैं, उन भगवान शंकर को नमस्कार है॥32॥
 
Salutations to Lord Shankar who has many forms, who has all forms and who is loved by all, who loves bark clothes, who wears a turban on his head, who has a beautiful face, who has a thousand eyes and who brings rain. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)