Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 7.202.28-29: कुन्तीनन्दन! अतः आपको भी भगवान शिव के उस शान्त स्वरूप को सदैव नमस्कार करना चाहिए। जो रुद्र, नीलकंठ, कृष्ठ (सूक्ष्म या कांतिमान), उत्तम कांति से युक्त, जटाधारी, विकराल रूप वाले, कर्णप्रिय नेत्रों वाले तथा कुबेर को वर देने वाले हैं, उन भगवान शिव को नमस्कार है। 28-29॥   |   mahabharat अध्याय 7.202: व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 202: व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  7.202.28-29 
नमस्कुरुष्व कौन्तेय तस्मै शान्ताय वै सदा॥ २८॥
रुद्राय शितिकण्ठाय कनिष्ठाय सुवर्चसे।
कपर्दिने करालाय हर्यक्षवरदाय च॥ २९॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीनन्दन! अतः आपको भी भगवान शिव के उस शान्त स्वरूप को सदैव नमस्कार करना चाहिए। जो रुद्र, नीलकंठ, कृष्ठ (सूक्ष्म या कांतिमान), उत्तम कांति से युक्त, जटाधारी, विकराल रूप वाले, कर्णप्रिय नेत्रों वाले तथा कुबेर को वर देने वाले हैं, उन भगवान शिव को नमस्कार है। 28-29॥
 
Kuntinandan! Therefore, you too should always salute that peaceful form of Lord Shiva. Salutations to Lord Shiva who is Rudra, Neelkanth, Knishtha (subtle or radiant), full of excellent radiance, wearing matted hair, having monstrous form, having pingle eyes and the one who gives boon to Kubera. 28-29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)