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mahabharat 7.202.139: वे विषम संख्या वाले पाँच प्राणों वाले जीवों के शरीर में निवास करते हैं और सदैव समभाव में रहते हैं। वे सभी प्रतिकूल परिस्थितियों में स्थित जीवों के भीतर प्राण वायु और अपान वायु के रूप में निवास करते हैं ॥139॥   |   mahabharat अध्याय 7.202: व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  7.202.139 
विषमस्थ: शरीरेषु समश्च प्राणिनामिह।
स वायुर्विषमस्थेषु प्राणोऽपान: शरीरिषु॥ १३९॥
 
 
अनुवाद
वे विषम संख्या वाले पाँच प्राणों वाले जीवों के शरीर में निवास करते हैं और सदैव समभाव में रहते हैं। वे सभी प्रतिकूल परिस्थितियों में स्थित जीवों के भीतर प्राण वायु और अपान वायु के रूप में निवास करते हैं ॥139॥
 
They reside in the bodies of living beings with the five pranas of odd number and always remain in equanimity. They reside in the form of prana vayu and apana vayu within all the living beings who are in adverse circumstances. ॥139॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)