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mahabharat 7.202.133: वे अनादि काल से विराट रूप में विद्यमान हैं, जीवन की उत्पत्ति और अस्तित्व के कारण हैं, तथा उनका लिंगरूपी शरीर सदैव स्थिर रहता है; इसलिए उन्हें 'स्थानु' कहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 7.202: व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  7.202.133 
महत् पूर्वं स्थितो यच्च प्राणोत्पत्तिस्थितश्च यत्।
स्थितलिङ्गश्च यन्नित्यं तस्मात् स्थाणुरिति स्मृत:॥ १३३॥
 
 
अनुवाद
वे अनादि काल से विराट रूप में विद्यमान हैं, जीवन की उत्पत्ति और अस्तित्व के कारण हैं, तथा उनका लिंगरूपी शरीर सदैव स्थिर रहता है; इसलिए उन्हें 'स्थानु' कहते हैं।
 
He has been present in a great form since time immemorial, is the cause of the origin and existence of life, and his lingam-like body is always stable; therefore, he is called 'Sthānu'. 133.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)