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mahabharat 7.202.13: वे जगत् की उत्पत्ति का स्थान, जगत् के बीज, विजयी, जगत् के आश्रय, सम्पूर्ण जगत् की आत्मा, जगत् के रचयिता, जगत् के स्वरूप और तेजोमय हैं ॥13॥   |   mahabharat अध्याय 7.202: व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  7.202.13 
जगद्योनिं जगद्‍बीजं जयिनं जगतो गतिम्।
विश्वात्मानं विश्वसृजं विश्वमूर्तिं यशस्विनम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
वे जगत् की उत्पत्ति का स्थान, जगत् के बीज, विजयी, जगत् के आश्रय, सम्पूर्ण जगत् की आत्मा, जगत् के रचयिता, जगत् के स्वरूप और तेजोमय हैं ॥13॥
 
He is the place of origin of the universe, the seed of the universe, the victorious one, the shelter of the universe, the soul of the entire universe, the creator of the universe, the form of the universe and the glorious one. ॥13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)