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mahabharat 7.202.127: भूत, वर्तमान और भविष्य में वे अनेक स्थावर और जंगम रूपों में विद्यमान रहते हैं; इसलिए उन्हें 'बहुरूप' कहा जाता है॥127॥   |   mahabharat अध्याय 7.202: व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  7.202.127 
यदस्य बहुधा रूपं भूतभव्यभवस्थितम्।
स्थावरं जङ्गमं चैव बहुरूपस्तत: स्मृत:॥ १२७॥
 
 
अनुवाद
भूत, वर्तमान और भविष्य में वे अनेक स्थावर और जंगम रूपों में विद्यमान रहते हैं; इसलिए उन्हें 'बहुरूप' कहा जाता है॥127॥
 
In the past, present and future, He exists in many mobile and immobile forms; hence He is called 'bahurupa'.॥ 127॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)