श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक d3h-71
 
 
श्लोक  7.201.d3h-71 
(स्वजानुभ्यां महीं गत्वा कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्।)
अभिवाद्याथ रुद्राय सद्योऽन्धकनिपातिने।
पद्माक्षस्तं विरूपाक्षमभितुष्टाव भक्तिमान्॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
कमलनेत्र भगवान श्रीहरि ने दोनों घुटनों के बल पृथ्वी पर टेककर और सिर पर हाथ जोड़कर अंधकासुर का नाश करने वाले रुद्रदेव को प्रणाम किया और भक्ति से परिपूर्ण होकर उन भगवान विरुपाक्ष की इस प्रकार स्तुति करने लगे॥71॥
 
Lotus-eyed Lord Shri Hari, kneeling on the earth with both his knees and folding his hands on his head, bowed down to Rudradev, the one who destroyed Andhakasura, and being full of devotion, he started praising that Lord Virupaksha in this way. 71॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)