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mahabharat 7.201.93: जो भगवान शंकर को परब्रह्म जानकर शिवलिंग में उनकी पूजा करता है, उसमें सनातन आत्मयोग (आत्मा-परमात्मा के तत्त्व का ज्ञान) और शास्त्रयोग (स्वयं उत्पन्न ज्ञान) स्थापित हो जाता है ॥93॥   |   mahabharat अध्याय 7.201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  7.201.93 
सर्वरूपं भवं ज्ञात्वा लिङ्गे योऽर्चयति प्रभुम्।
आत्मयोगाश्च तस्मिन् वै शास्त्रयोगाश्च शाश्वता:॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
जो भगवान शंकर को परब्रह्म जानकर शिवलिंग में उनकी पूजा करता है, उसमें सनातन आत्मयोग (आत्मा-परमात्मा के तत्त्व का ज्ञान) और शास्त्रयोग (स्वयं उत्पन्न ज्ञान) स्थापित हो जाता है ॥93॥
 
The one who worships Lord Shankar in Shivalinga knowing him as the Supreme Being, in him Sanatan Atmayoga (knowledge of the essence of soul-God) and Shastrayoga (self-generated knowledge) are established. 93॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)