श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 88-89
 
 
श्लोक  7.201.88-89 
तथैव कर्मणा कृत्स्नं महतस्तपसोऽपि च।
तेजो मन्युं च बिभ्रत्त्वं जातो रौद्रो महामते॥ ८८॥
स भवान् देववत् प्राज्ञो ज्ञात्वा भवमयं जगत्।
अवाकर्षस्त्वमात्मानं नियमैस्तत्प्रियेप्सया॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
महामते! तुम भी (पूर्वजन्म में) भगवान नारायण के समान ज्ञानी होकर, उन्हीं के समान उत्तम कर्म और महान तप करके तेज और क्रोध से युक्त रुद्र के भक्त हुए थे। सम्पूर्ण जगत को शंकर से परिपूर्ण जानकर, उन्हें प्रसन्न करने की इच्छा से तुमने नाना प्रकार के कठोर नियमों का पालन करके अपने शरीर को दुर्बल कर लिया था॥ 88-89॥
 
Mahamate! You too (in your previous birth) being as knowledgeable as Lord Narayana, by performing good deeds and great penance like him, had become a devotee of Rudra, full of brilliance and anger. Knowing the entire world to be filled with Shankara, with the desire to please him, you had weakened your body by following various types of strict rules. ॥ 88-89॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)