जलं दिशं खं क्षितिं चन्द्रसूर्यौ
तथा वाय्वग्नी प्रमिमाणं जगच्च।
नालं द्रष्टुं यं जना भिन्नवृत्ता
ब्रह्मद्विषघ्नममृतस्य योनिम्॥ ६७॥
अनुवाद
जल, दिशा, आकाश, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि और जगत् को नापने वाला काल - ये सब उन्हीं के स्वरूप हैं। वे ब्रह्मद्वेषियों का नाश करने वाले और मोक्ष के परम कारण हैं। दुष्ट मनुष्य उन्हें देख नहीं सकते ॥67॥
Water, direction, sky, earth, moon, sun, wind, fire and time which measures the world – all these are His manifestations. He is the destroyer of traitors of Brahman and the ultimate cause of salvation. Wicked men are incapable of seeing Him. ॥ 67॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥