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mahabharat 7.201.67: जल, दिशा, आकाश, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि और जगत् को नापने वाला काल - ये सब उन्हीं के स्वरूप हैं। वे ब्रह्मद्वेषियों का नाश करने वाले और मोक्ष के परम कारण हैं। दुष्ट मनुष्य उन्हें देख नहीं सकते ॥67॥   |   mahabharat अध्याय 7.201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  7.201.67 
जलं दिशं खं क्षितिं चन्द्रसूर्यौ
तथा वाय्वग्नी प्रमिमाणं जगच्च।
नालं द्रष्टुं यं जना भिन्नवृत्ता
ब्रह्मद्विषघ्नममृतस्य योनिम्॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
जल, दिशा, आकाश, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि और जगत् को नापने वाला काल - ये सब उन्हीं के स्वरूप हैं। वे ब्रह्मद्वेषियों का नाश करने वाले और मोक्ष के परम कारण हैं। दुष्ट मनुष्य उन्हें देख नहीं सकते ॥67॥
 
Water, direction, sky, earth, moon, sun, wind, fire and time which measures the world – all these are His manifestations. He is the destroyer of traitors of Brahman and the ultimate cause of salvation. Wicked men are incapable of seeing Him. ॥ 67॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)