श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  7.201.60 
अथापरं तपस्तप्त्वा द्विस्ततोऽन्यत् पुनर्महत्।
द्यावापृथिव्योर्विवरं तेजसा समपूरयत्॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उन्होंने दुगुने समय तक घोर तपस्या की और पृथ्वी तथा आकाश के बीच के स्थान को अपने तेज से भर दिया।
 
Thereafter he performed intense penance for twice the time and filled the space between the earth and sky with his radiance.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)