श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  7.201.16-17 
दृश्यादृश्यानरिगणानुद्दिश्याचार्यनन्दन:॥ १६॥
सोऽभिमन्त्र्य शरं दीप्तं विधूममिव पावकम्।
सर्वत: क्रोधमाविश्य चिक्षेप परवीरहा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तब धूम्ररहित अग्नि के समान तेजस्वी बाण अभिमंत्रित करके शत्रु योद्धाओं का नाश करने वाले आचार्यनन्दन अश्वत्थामा ने पूर्ण क्रोध में भरकर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शत्रुओं की ओर उसे चलाया ॥16-17॥
 
Then Acharyanandan Ashwatthama, the one who destroyed the enemy warriors by inviting a bright arrow like smokeless fire, filled with full rage, fired it towards the direct and indirect enemies. 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)