श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 200: श्रीकृष्णका भीमसेनको रथसे उतारकर नारायणास्त्रको शान्त करना, अश्वत्थामाका उसके पुन: प्रयोगमें अपनी असमर्थता बताना तथा अश्वत्थामाद्वारा धृष्टद्युम्नकी पराजय, सात्यकिका दुर्योधन, कृपाचार्य, कृतवर्मा, कर्ण और वृषसेन—इन छ: महारथियोंको भगा देना फिर अश्वत्थामाद्वारा मालव, पौरव और चेदिदेशके युवराजका वध एवं भीम और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा पाण्डव-सेनाका पलायन  »  श्लोक 96-97h
 
 
श्लोक  7.200.96-97h 
ते जत्रुदेशमासाद्य द्रोणपुत्रस्य मारिष॥ ९६॥
निर्भिद्य विविशुस्तूर्णं वल्मीकमिव पन्नगा:।
 
 
अनुवाद
माननीय महाराज! जैसे साँप शीघ्रता से अपने बिल में घुस जाता है, उसी प्रकार वे बाण द्रोणपुत्र के गले की हड्डी को छेदकर भीतर घुस गए॥96 1/2॥
 
Honorable King! Just as a snake quickly enters its hole, similarly those arrows pierced the collarbone of Drona's son's neck and entered inside. ॥96 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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