| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 200: श्रीकृष्णका भीमसेनको रथसे उतारकर नारायणास्त्रको शान्त करना, अश्वत्थामाका उसके पुन: प्रयोगमें अपनी असमर्थता बताना तथा अश्वत्थामाद्वारा धृष्टद्युम्नकी पराजय, सात्यकिका दुर्योधन, कृपाचार्य, कृतवर्मा, कर्ण और वृषसेन—इन छ: महारथियोंको भगा देना फिर अश्वत्थामाद्वारा मालव, पौरव और चेदिदेशके युवराजका वध एवं भीम और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा पाण्डव-सेनाका पलायन » श्लोक 84 |
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| | | | श्लोक 7.200.84  | स पौरवं रथशक्त्या निहत्य
छित्त्वा रथं तिलशश्चास्य बाणै:।
छित्त्वा च बाहू वरचन्दनाक्तौ
भल्लेन कायाच्छिर उच्चकर्त॥ ८४॥ | | | | | | अनुवाद | | फिर उसने अपने रथ के बल से पौरव को घायल करके बाणों से उसके रथ को तिल के बराबर टुकड़े-टुकड़े कर दिया और उसकी सुन्दर चन्दन से लिपी हुई दोनों भुजाओं को काटकर भाले से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया ॥84॥ | | | | Then, having wounded Paurava with his chariot's power, he broke his chariot into pieces the size of a sesame seed with his arrows, and having cut off his two arms, which were beautifully smeared with sandalwood, he severed his head from the body with a spear. ॥ 84॥ | | ✨ ai-generated | | |
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