| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 200: श्रीकृष्णका भीमसेनको रथसे उतारकर नारायणास्त्रको शान्त करना, अश्वत्थामाका उसके पुन: प्रयोगमें अपनी असमर्थता बताना तथा अश्वत्थामाद्वारा धृष्टद्युम्नकी पराजय, सात्यकिका दुर्योधन, कृपाचार्य, कृतवर्मा, कर्ण और वृषसेन—इन छ: महारथियोंको भगा देना फिर अश्वत्थामाद्वारा मालव, पौरव और चेदिदेशके युवराजका वध एवं भीम और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा पाण्डव-सेनाका पलायन » श्लोक 67 |
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| | | | श्लोक 7.200.67  | स तं निर्भिद्य तेनास्त: सायक: सशरावरम्।
विवेश वसुधां भित्त्वा श्वसन् बिलमिवोरग:॥ ६७॥ | | | | | | अनुवाद | | उनके द्वारा छोड़ा गया बाण कवच सहित सात्यकि के शरीर को छेदता हुआ पृथ्वी को चीरता हुआ उसके अन्दर घुस गया, जैसे फुंफकारता हुआ सर्प अपने बिल में घुस जाता है। | | | | The arrow shot by him pierced Satyaki's body including his armour and, tearing through the earth, entered inside it, just as a hissing serpent enters its hole. | | ✨ ai-generated | | |
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