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श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 200: श्रीकृष्णका भीमसेनको रथसे उतारकर नारायणास्त्रको शान्त करना, अश्वत्थामाका उसके पुन: प्रयोगमें अपनी असमर्थता बताना तथा अश्वत्थामाद्वारा धृष्टद्युम्नकी पराजय, सात्यकिका दुर्योधन, कृपाचार्य, कृतवर्मा, कर्ण और वृषसेन—इन छ: महारथियोंको भगा देना फिर अश्वत्थामाद्वारा मालव, पौरव और चेदिदेशके युवराजका वध एवं भीम और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा पाण्डव-सेनाका पलायन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  7.200.54 
अश्वत्थामा तु सम्प्राप्य चेतनां भरतर्षभ।
चिन्तयामास दु:खार्तो नि:श्वसंश्च पुन: पुन:॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! जब अश्वत्थामा को होश आया, तो वह शोक से व्याकुल हो गया और कुछ देर तक विचारों में डूबा रहा तथा बार-बार गहरी साँसें लेता रहा।
 
O best of the Bharatas! When Ashvatthama regained consciousness, he was overcome with grief and remained lost in thought for some time, taking deep breaths repeatedly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)