| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 200: श्रीकृष्णका भीमसेनको रथसे उतारकर नारायणास्त्रको शान्त करना, अश्वत्थामाका उसके पुन: प्रयोगमें अपनी असमर्थता बताना तथा अश्वत्थामाद्वारा धृष्टद्युम्नकी पराजय, सात्यकिका दुर्योधन, कृपाचार्य, कृतवर्मा, कर्ण और वृषसेन—इन छ: महारथियोंको भगा देना फिर अश्वत्थामाद्वारा मालव, पौरव और चेदिदेशके युवराजका वध एवं भीम और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा पाण्डव-सेनाका पलायन » श्लोक 31 |
|
| | | | श्लोक 7.200.31  | त्वयि शस्त्राणि दिव्यानि त्र्यम्बके चामितौजसि।
इच्छतो न हि ते मुच्येत् संक्रुद्धो हि पुरंदर:॥ ३१॥ | | | | | | अनुवाद | | समस्त दिव्यास्त्र आपमें तथा अनन्त तेजोमय भगवान शंकर में विद्यमान हैं। यदि आप मारना चाहें, तो क्रोध में भरे हुए इंद्र भी आपसे बच नहीं सकते॥31॥ | | | | All the divine weapons are present in you and in the infinitely radiant Lord Shankar. If you wish to kill, even Indra, filled with rage, cannot escape from you.॥ 31॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|