श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 200: श्रीकृष्णका भीमसेनको रथसे उतारकर नारायणास्त्रको शान्त करना, अश्वत्थामाका उसके पुन: प्रयोगमें अपनी असमर्थता बताना तथा अश्वत्थामाद्वारा धृष्टद्युम्नकी पराजय, सात्यकिका दुर्योधन, कृपाचार्य, कृतवर्मा, कर्ण और वृषसेन—इन छ: महारथियोंको भगा देना फिर अश्वत्थामाद्वारा मालव, पौरव और चेदिदेशके युवराजका वध एवं भीम और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा पाण्डव-सेनाका पलायन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  7.200.25 
अश्वत्थामन् पुन: शीघ्रमस्त्रमेतत् प्रयोजय।
अवस्थिता हि पञ्चाला: पुनरेते जयैषिण:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
अश्वत्थामा! तुम शीघ्र ही इस अस्त्र का पुनः प्रयोग करो; क्योंकि विजय की इच्छा रखने वाले ये पांचाल सैनिक पुनः युद्ध के लिए आकर डटे हुए हैं।'
 
Ashvatthaman! You should use this weapon again soon; because these Panchala soldiers, desirous of victory, have once again come and stood firm for the battle.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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