श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 200: श्रीकृष्णका भीमसेनको रथसे उतारकर नारायणास्त्रको शान्त करना, अश्वत्थामाका उसके पुन: प्रयोगमें अपनी असमर्थता बताना तथा अश्वत्थामाद्वारा धृष्टद्युम्नकी पराजय, सात्यकिका दुर्योधन, कृपाचार्य, कृतवर्मा, कर्ण और वृषसेन—इन छ: महारथियोंको भगा देना फिर अश्वत्थामाद्वारा मालव, पौरव और चेदिदेशके युवराजका वध एवं भीम और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा पाण्डव-सेनाका पलायन  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  7.200.15-16 
तमब्रवीद् वासुदेव: किमिदं पाण्डुनन्दन।
वार्यमाणोऽपि कौन्तेय यद् युद्धान्न निवर्तसे॥ १५॥
यदि युद्धेन जेया: स्युरिमे कौरवनन्दना:।
वयमप्यत्र युध्येम तथा चेमे नरर्षभा:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा - 'पाण्डुनन्दन! कुन्तीकुमार! यह क्या बात है कि मना करने पर भी तुम युद्ध से निवृत्त नहीं हो रहे हो? यदि इस समय युद्ध से ही इन कौरवनन्दन को जीता जा सकता होता, तो हम और ये सभी श्रेष्ठ राजा केवल युद्ध ही करते।'
 
At that time Lord Shri Krishna said to him – 'Pandunandan! Kuntikumar! What is this that you are not retiring from the war even after refusing? If this Kauravanandan could have been won only by war at this time, then we and all these great kings would have fought only.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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