श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 200: श्रीकृष्णका भीमसेनको रथसे उतारकर नारायणास्त्रको शान्त करना, अश्वत्थामाका उसके पुन: प्रयोगमें अपनी असमर्थता बताना तथा अश्वत्थामाद्वारा धृष्टद्युम्नकी पराजय, सात्यकिका दुर्योधन, कृपाचार्य, कृतवर्मा, कर्ण और वृषसेन—इन छ: महारथियोंको भगा देना फिर अश्वत्थामाद्वारा मालव, पौरव और चेदिदेशके युवराजका वध एवं भीम और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा पाण्डव-सेनाका पलायन  »  श्लोक 131-132
 
 
श्लोक  7.200.131-132 
ते वध्यमाना: समरे द्रोणपुत्रेण पार्थिवा:॥ १३१॥
द्रोणपुत्रभयाद् राजन् दिश: सर्वाश्च भेजिरे॥ १३२॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! जब युद्धस्थल में द्रोणपुत्र के द्वारा सब राजा मारे जा रहे थे, तब वे भयभीत होकर भागकर सब दिशाओं में शरण लेने लगे ॥131-132॥
 
O King! When all the kings were being killed by Drona's son in the battlefield, they fled in fear and took refuge in all directions. ॥131-132॥
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वण्यश्वत्थामपराक्रमे द्विशततमोऽध्याय:॥ २००॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें अश्वत्थामाका पराक्रमविषयक दो सौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २००॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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