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mahabharat 7.20.57: लोगों के पैर टखनों तक खून से सनी कीचड़ में धँस जाते थे। उस समय वे धधकती दावानल से घिरे विशाल वृक्षों जैसे प्रतीत होते थे। 57.   |   mahabharat अध्याय 7.20: द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 20: द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  7.20.57 
आगुल्फेभ्योऽवसीदन्ते नरा लोहितकर्दमै:।
दीप्यमानै: परिक्षिप्ता दावैरिव महाद्रुमा:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
लोगों के पैर टखनों तक खून से सनी कीचड़ में धँस जाते थे। उस समय वे धधकती दावानल से घिरे विशाल वृक्षों जैसे प्रतीत होते थे। 57.
 
The feet of men would sink up to the ankles in the bloody mud. At that time they would look like huge trees surrounded by a blazing forest fire. 57.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)