vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 7: द्रोण पर्व
»
अध्याय 20: द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार
»
श्लोक 57
श्लोक
7.20.57
आगुल्फेभ्योऽवसीदन्ते नरा लोहितकर्दमै:।
दीप्यमानै: परिक्षिप्ता दावैरिव महाद्रुमा:॥ ५७॥
अनुवाद
लोगों के पैर टखनों तक खून से सनी कीचड़ में धँस जाते थे। उस समय वे धधकती दावानल से घिरे विशाल वृक्षों जैसे प्रतीत होते थे। 57.
The feet of men would sink up to the ankles in the bloody mud. At that time they would look like huge trees surrounded by a blazing forest fire. 57.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×