श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 20: द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  7.20.50 
सादितै: सगजारोहै: सपताकै: समन्तत:।
मातङ्गै: शुशुभे भूमिर्विकीर्णैरिव पर्वतै:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
मारे हुए हाथियों, उनकी ध्वजाओं और घुड़सवारों से आच्छादित भूमि ऐसी शोभा पा रही थी मानो वह इधर-उधर बिखरे हुए पर्वत के टुकड़ों से आच्छादित हो ॥50॥
 
The ground covered with the slain elephants, along with their flags and horse-riders, looked as beautiful as if it were covered with mountain fragments scattered here and there. ॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)