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mahabharat 7.20.46: बहुत से हाथी, मनुष्यों से रहित होकर, चिंघाड़ते हुए इधर-उधर घूम रहे थे। वे एक-दूसरे की सेनाओं में घुसकर फटे हुए बादलों की तरह टुकड़े-टुकड़े होकर धरती पर गिर रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 7.20: द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 20: द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  7.20.46 
निर्मनुष्याश्च मातङ्गा विनदन्तस्ततस्तत:।
छिन्नाभ्राणीव सम्पेतु: सम्प्रविश्य परस्परम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
बहुत से हाथी, मनुष्यों से रहित होकर, चिंघाड़ते हुए इधर-उधर घूम रहे थे। वे एक-दूसरे की सेनाओं में घुसकर फटे हुए बादलों की तरह टुकड़े-टुकड़े होकर धरती पर गिर रहे थे।
 
Many elephants, devoid of humans, were roaming around screaming. They entered each other's armies and fell to the ground in pieces like torn clouds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)