श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 20: द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  7.20.34 
चूडामणिषु निष्केषु भूषणेष्वपि वर्मसु।
तेषामादित्यवर्णाभा रश्मय: प्रचकाशिरे॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
उन वीरों के मुकुट, हार, आभूषण और कवच सूर्य के समान तेजस्वी किरणें बिखेर रहे थे।
 
The crowns, necklaces, ornaments and armour of those heroes were radiating radiant rays like the sun.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)