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mahabharat 7.20.32: महाराज! कुछ क्षणों तक तो युद्ध देखने में बड़ा ही आनन्ददायक प्रतीत हुआ; किन्तु बाद में वे पागलों की भाँति एक-दूसरे को बेरहमी से मारने लगे।   |   mahabharat अध्याय 7.20: द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 20: द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  7.20.32 
मुहूर्तमिव तद् युद्धमासीन्मधुरदर्शनम्।
तत उन्मत्तवद् राजन् निर्मर्यादमवर्तत॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
महाराज! कुछ क्षणों तक तो युद्ध देखने में बड़ा ही आनन्ददायक प्रतीत हुआ; किन्तु बाद में वे पागलों की भाँति एक-दूसरे को बेरहमी से मारने लगे।
 
King! For a few moments the battle seemed very pleasant to watch; but later on they began to kill each other like madmen without any limits.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)