हुताशनाभ: स हुताशनप्रभे
शुभ: शुभे वै स्वरथे धनुर्धर:।
स्थितो रराजाधिरथिर्महारथ:
स्वयं विमाने सुरराडिवास्थित:॥ ३७॥
अनुवाद
अग्नि के समान तेजस्वी सुन्दर रथ पर बैठकर महारथी, सुन्दर धनुर्धर अधिरथपुत्र कर्ण विमान में बैठे हुए देवराज इन्द्र के समान सुशोभित हो रहे थे ॥37॥
Sitting on his beautiful chariot, radiant as fire, Adhiratha's son Karna, a great charioteer and a handsome and archer, was adorned like Devraj Indra seated in the plane. 37॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि कर्णनिर्याणे द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें कर्णकी रणयात्राविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ॥ २॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३८ श्लोक हैं।)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)