| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 199: अश्वत्थामाके द्वारा नारायणास्त्रका प्रयोग, राजा युधिष्ठिरका खेद, भगवान् श्रीकृष्णके बताये हुए उपायसे सैनिकोंकी रक्षा, भीमसेनका वीरोचित उद्गार और उनपर उस अस्त्रका प्रबल आक्रमण » श्लोक 2-3 |
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| | | | श्लोक 7.199.2-3  | ध्वजद्रुमं शस्त्रशृङ्गं हतनागमहाशिलम्।
अश्वकिम्पुरुषाकीर्णं शरासनलतावृतम्॥ २॥
क्रव्यादपक्षिसंघुष्टं भूतयक्षगणाकुलम्।
निहत्य शात्रवान् भल्लै: सोऽचिनोद् देहपर्वतम्॥ ३॥ | | | | | | अनुवाद | | उसने अपने भालों से शत्रु सैनिकों को मारकर उनकी लाशों को पर्वत के समान ढेर कर दिया। ध्वजाएँ उस पर्वत के वृक्षों के समान थीं, अस्त्र-शस्त्र उसकी चोटी के समान थे और मारे गए हाथी उसकी विशाल चट्टानों के समान थे। घोड़े उस पर्वत पर रहने वाले किंपुरुषों के समान थे। धनुष उस पर्वत को फैलाने और ढकने वाली लताओं के समान थे। मांसाहारी पशु चहचहाते पक्षियों के समान थे और भूतों के समूह वहाँ विचरण करने वाले यक्षों के समान थे॥2-3॥ | | | | He killed the enemy soldiers with his spears and piled up their corpses like a mountain. The flags were like the trees of that mountain, the weapons were like its peak and the slain elephants were like its huge rocks. The horses were like the Kimpurushas living on that mountain. The bows were like creepers spreading and covering it. The carnivorous animals were like the chirping birds and the groups of ghosts were like the Yakshs roaming there.॥2-3॥ | | ✨ ai-generated | | |
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