श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 198: सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण  »  श्लोक 65-66h
 
 
श्लोक  7.198.65-66h 
शृण्वन् पाञ्चालवाक्यानि सात्यकि: सर्पवच्छ्वसन्॥ ६५॥
भीमबाह्वन्तरे सक्तो विस्फुरत्यनिशं बली।
 
 
अनुवाद
धृष्टद्युम्न के वचन सुनकर भीमसेन की भुजाओं में फँसे हुए बलवान सात्यकि सर्प के समान फुफकारने लगे, लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगे और छूटने का निरंतर प्रयत्न करने लगे।
 
The powerful Satyaki, trapped in Bhimasena's arms, on hearing Dhrishtadyumna's words, was hissing like a snake and drawing in long breaths and constantly trying to break free. 65 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)