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श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 198: सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण  »  श्लोक 60-62h
 
 
श्लोक  7.198.60-62h 
मुञ्च मुञ्च शिने: पौत्रं भीम युद्धमदान्वितम्॥ ६०॥
आसादयतु मामेष धराधरमिवानिल:।
यावदस्य शितैर्बाणै: संरम्भं विनयाम्यहम्॥ ६१॥
युद्धश्रद्धां च कौन्तेय जीवितं चास्य संयुगे।
 
 
अनुवाद
भीमसेन! शिनिके के इस पौत्र को अपने युद्ध कौशल पर बहुत अभिमान है। आपको इसे जाने देना चाहिए, जाने देना चाहिए। जैसे पवन पर्वत से टकराता है, वैसे ही इसे मेरे पास आकर युद्ध करने दो। कुंतीपुत्र! मैं तीखे बाणों से इसके क्रोध का नाश कर दूँगा। साथ ही इसकी युद्ध-भावना और जीवन भी समाप्त कर दूँगा।
 
Bhimsena! This grandson of Shinike is very proud of his war skills. You should let him go, let him go. Just like the wind hits the mountain, let him come and fight with me. Son of Kunti! I will put an end to his anger with sharp arrows. Along with that I will also end his fighting spirit and life.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)