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mahabharat 7.198.55-56h: वार्ष्णेय! यदि पांचाल लोग समुद्र तक सारी पृथ्वी छान मारें, तो भी उन्हें पाण्डवों और वृष्णिवंशियों के समान कोई दूसरा मित्र नहीं मिलेगा।   |   mahabharat अध्याय 7.198: सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 198: सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण  »  श्लोक 55-56h
 
 
श्लोक  7.198.55-56h 
पंचालानां च वार्ष्णेय समुद्रान्तां विचिन्वताम्॥ ५५॥
नान्यदस्ति परं मित्रं यथा पाण्डववृष्णय:।
 
 
अनुवाद
वार्ष्णेय! यदि पांचाल लोग समुद्र तक सारी पृथ्वी छान मारें, तो भी उन्हें पाण्डवों और वृष्णिवंशियों के समान कोई दूसरा मित्र नहीं मिलेगा।
 
Varshneya! Even if the Panchalas search the entire earth up to the sea, they will not find any other friend like the Pandavas and the people of the Vrishni clan. 55 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)